Monday, 4 March 2019

Rich dad poor Dad



रॉबर्ट कियोसाकी जोकि इस किताब के लेखक है, उनके दो पिता थे. उनके एक पिता जो पढ़े-लिखे, पी.एच.डी होल्डर थे मगर जिंदगी भर गरीब ही रहे और गरीबी में ही मरे. इसलिए रॉबर्ट उन्हें Poor डैड कहते थे. वहीँ उनके दुसरे पिता बहुत पढ़े लिखे तो नहीं थे मगर काफी अमीर थे. उन्हें रॉबर्ट Rich डैड बुलाते थे. अब ये सोचने की बात है कि किसी भी इंसान के एक ही वक्त में दो पिता कैसे हो सकते है.
उनके गरीब पिता का बस एक ही सपना था कि रॉबर्ट खूब मेहनत से पढ़ाई करने के बाद किसी बड़ी सी कंपनी में नौकरी करके अपना भविष्य सुरक्षित कर ले. मगर रॉबर्ट के दुसरे पिता जो अमीर थे, वे दरअसल रॉबर्ट के दोस्त माइक के पिता थे. वे चाहते थे कि रॉबर्ट अपनी जिंदगी में कुछ चेलेन्ज ले. क्योंकि सारे सबक सिर्फ स्कूल में ही नहीं सीखे जाते. कुछ सबक ऐसे होते है जिन्हें इंसान अपनी जिंदगी के तजुरबो से ही सीखता है. स्कूली पढ़ाई सिर्फ अच्छे ग्रेड्स दिला सकती है मगर जिंदगी की पढ़ाई बहुत कुछ सिखाती है. बेशक पढ़ाई-लिखाई की अपनी अहमियत है मगर सिर्फ इसके भरोसे बैठकर ही सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता.


उनके गरीब पिता का बस एक ही सपना था कि रॉबर्ट खूब मेहनत से पढ़ाई करने के बाद किसी बड़ी सी कंपनी में नौकरी करके अपना भविष्य सुरक्षित कर ले. मगर रॉबर्ट के दुसरे पिता जो अमीर थे, वे दरअसल रॉबर्ट के दोस्त माइक के पिता थे. वे चाहते थे कि रॉबर्ट अपनी जिंदगी में कुछ चेलेन्ज ले. क्योंकि सारे सबक सिर्फ स्कूल में ही नहीं सीखे जाते. कुछ सबक ऐसे होते है जिन्हें इंसान अपनी जिंदगी के तजुरबो से ही सीखता है. स्कूली पढ़ाई सिर्फ अच्छे ग्रेड्स दिला सकती है मगर जिंदगी की पढ़ाई बहुत कुछ सिखाती है. बेशक पढ़ाई-लिखाई की अपनी अहमियत है मगर सिर्फ इसके भरोसे बैठकर ही सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता.


Lesson 1अमीर लोग पैसे के लिए काम नहीं करते


एक बार एक आदमी था जिसके पास एक गधा था. जब भी उसे अपने गधे से कुछ मेहनत करवानी होती थी तो वे एक गाजर को उसके सामने लटका देता था. उस गाज़र को देखते ही गधा उसे खाने के लालच में काम करता चला जाता था. उसे उम्मीद थी कि एक दिन वो उस गाज़र tak पहुँच ही जाएगा. अब ये उस आदमी के लिए तो एक अच्छी तरकीब बन गयी मगर बेचारे गधे को कभी भी वो गाज़र नहीं मिल पायी. क्यों? इसलिए कि वो गाज़र बस एक छलावा है. बहुत से लोग ठीक उस गधे की तरह ही होते है. वे मेहनत पर मेहनत किये चले जाते है, इस उम्मीद में कि एक दिन वे अमीर बन जायेंगे. मगर पैसा उनके लिए महज़ एक सपना बन के रह जाता है. इस sapne ke piche भागने से आप उस तक कभी नहीं पहुँच सकते. तो पैसे के लिए काम करने के बजाये पैसे को अपने लिए काम करने दे.


जब आप अमीर बनना चाहते है तो सिर्फ पैसे कमाने के लिए काम ना करे. क्योंकि जैसे ही हम अमीर बनने की राह में कदम बढ़ाते है, हमारा डर और लालच हम पर हावी होने लगता है कि कहीं हम गरीब के गरीब ही ना रह जाये. इसी डर से हम और ज्यादा मेहनत करने में जुट जाते है. फिर हमारा लालच हम पर हावी होने लगता है. हम उन सारी खूबसूरत चीजों की कल्पना करने लगते है जो पैसे से हासिल की जा सकती है. अब यही डर और लालच हमें ऐसे चक्कर में उलझा देता है जो कभी ख़त्म नहीं होता. तो हम अब और मेहनत करते है कि और ज्यादा कमा सके और फिर हमारा खर्च भी उसी हिसाब से बढ़ने लगता है. इसको ही अमीर डेड “RAT RACE” कहते है. अब इसका नतीजा ये हुआ कि हम पैसे कमाने के लिए हद से ज्यादा मेहनत करते है, खर्च करते है. ये एक ट्रेप है. और आपको लालच और डर का ये ट्रेप अवॉयड करना है. क्योंकि हममें से अधिकतर लोग जो अमीर होना चाहते है, इसी ट्रेप का शिकार हो जाते है. पैसे के पीछे मत भागिए बल्कि पैसे को अपने पीछे भागने के लिए मजबूर कर दीजिए. आपकी नौकरी लगी है तो काम पर ये सोच कर मत जाईये कि हर महीने आपको एक पे-चेक lena hai. क्योंकि वो पे-चेक आपके सारे बिल्स मुश्किल से ही भर पाता है. ये हर महीने की कहानी बन जाती है. फिर तंग आकर आप कोई दूसरी नौकरी ढूंढकर और ज्यादा मेहनत करने लगते है. लेकिन तब भी आप पैसे के लिए ही काम कर रहे होते है. और यही वजह है कि आप कभी अमीर नहीं बन पाते.


सच का सामना कीजिये. आप खुद के लिए जवाबदेह है दुसरो के लिए नहीं. तो आपके जो भी सवाल है, खुद से पूछिए क्योंकि उनका जवाब सिर्फ आपके ही पास है. क्या आप सिर्फ इसलिए काम कर रहे है कि आपकी जिंदगी में सिक्योरिटी रहे ? एक ऐसी नौकरी जहाँ से आपको निकाले जाने का कोई डर न हो ? या फिर आप सिर्फ दो पैसे कमाने के लिए काम करते है ? और आपको लगता है कि एक दिन आप इस तरह अमीर हो जायेंगे. क्या बस यही आपको सेटीस फाई करने के लिए काफी है ? अगर आपका जवाब हां है तो मुझे आपकी सोच पर अफ़सोस है क्योंकि आपने जो अमीर बनने का सपना देखा है वो कभी पूरा नहीं होने वाला. आप हमेशा गरीबी में ही जियेंगे. लेकिन अगर आपका जवाब “ना” है तो आपका पहला कदम ये होगा कि सबसे पहले आप अपने मन से डर हटा दीजिये. क्योंकि ज्यादा पैसा ना कमा पाने का डर और लालच ही आपको बगैर सोचे-समझे काम करने के लिए मजबूर करता है. और हमारा यही कदम हमें नाकामयाबी की तरफ धकेलता है. बेशक हम सब के अन्दर डर और चाहत की भावना होती है लेकिन उन्हें खुद पर इतना हावी ना होने दे कि हम उनके बस में होकर उलटे-सीधे फैसले लेने लग जाए. बेहतर होगा कि हम जो भी करे पहले उसके बारे में खूब सोच ले. हमेशा दिल से नहीं बल्कि दिमाग से काम ले.


हर सुबह अपने आप से पूछिए क्या आप उतना कर पा रहे है जितना कि आपको करना चाहिए? क्या आप अपनी पोटेंशियल का पूरा इस्तेमाल कर पा रहे है ? आम लोगो की तरह सोचना छोड़ दीजिये जो काम सिर्फ और सिर्फ पैसे के लिए करते है. ये सोचना छोड़ दीजिये कि “ मेरा बॉस कम पैसा देता है, मुझे ज्यादा मिलना चाहिए, मै इससे ज्यादा कमा सकता हूँ”. याद रखिये, आपकी परेशानियों के लिए सिर्फ आप जिम्मेदार है, कोई और नहीं. बॉस आपकी सेलेरी NAHI बडाता तो उसे इल्जाम मत दीजिये, टैक्स को इल्जाम मत दीजिये. जब आप खुद की समस्याओं की जिम्मेदारी लेते है तब सिर्फ आप ही उसका हल निकाल सकते है. यही वो पहला सबक है जो अमीर डेड ने रॉबर्ट को सिखाया.



इस सबक का एक पार्ट ये भी था कि अमीर डेड ने उन्हें एक कंवीनीयेंस स्टोर में काम पर लगा दिया. उन्हें इस काम के कोई पैसे नहीं मिले. वे बस काम करते रहे. इसका फायदा ये हुआ कि वे अपने दिल से काम में लगे रहे और इस दौरान कई नये आइडिया उनके दिमाग में आते रहे. पैसे को अपने पीछे कैसे भगाया जाए इस बारे में उन्हें कई विचार मिले. उन्होंने देखा कि उस स्टोर की क्लर्क कोमिक्स बुक के फ्रंट पेज को दो हिस्सों में फाड़ देती थी. आधा हिस्सा वो रख लेती और आधा हिस्सा फेंक देती थी. देर शाम स्टोर में एक डिस्ट्रीब्युटर आया करता था. वो कोमिक्स बुक के उपरी आधे हिस्से को क्रेडिट के लिए लेता और बदले में नयी कोमिक्स बुक्स दे जाया करता. एक दिन उन्होंने उस डिस्ट्रीब्युटर से पूछा कि क्या वो पुरानी कोमिक्स बुक्स ले सकते है. वो इस शर्त पर मान गया कि वे उन कोमिक्स को बेचेंगे नहीं. ये उनके दिमाग में बिजनेस का एक नया आइडिया था. उन्होंने वे पुरानी कोमिकबुक्स अपने दोस्तों और बाकी बच्चो को पढने के लिए किराए पर देनी शुरू कर दी. बदले में वे हर किताब का 10 सेंट किराया वसूल करते थे. हर किताब सिर्फ दो घंटे के हिसाब से पढने के लिए दी जाती थी तो असल मायनों में वे उन्हें बेच नहीं रहे थे. उन्हें उस गेराज पर काम भी नहीं करना पड़ा जहाँ से वे कोमिक्स किराए पर देते थे. उन्होंने माइक की बहन को काम पर रखा जिसके लिए उसे हर हफ्ते 1 डॉलर दिया जाता. एक ही हफ्ते में उन्होंने 9.5 डॉलर कमाए. इस तरह उन्होंने सीखा कि पैसे को खुद के लिए काम करने दो ना कि आप पैसे के लिए काम करो.



सबक 2: फिनेंसियल लीटरेसी क्यों सिखाई जाए ?



1923 में एजवाटर बीच होटल, शिकागो में एक मीटिंग हुई. दुनिया के बहुत से लीडर और बेहद अमीर बिजनेसमेन इस मीटिंग का हिस्सा बने. इनमे से थे एक बहुत बड़ी स्टील कंपनी के मालिक चार्ल्स शवाब और समुअल इंसुल उस वक्त की लार्जेस्ट यूटीलिटी प्रेजिडेंट और बाकी कई और बड़े बिजनेसमेन. इस मीटिंग के 25 साल बाद इनमे से कई लोग गरीबी में मरे, कुछ ने ख़ुदकुशी कर ली थी और कईयों ने तो अपना दिमागी संतुलन खो दिया था.

असल बात तो ये है कि लोग पैसे कमाने में इतने मशगूल हो जाते है कि वो ये ख़ास बात सीखना भूल जाते है कि पैसे को रखा कैसे जाए. आप चाहे जितना मर्ज़ी पैसा कमा ले, उसे बनाये रखना असली बात है. और अगर ये हुनर आपने सीख लिया तो आप किसी भी आड़े-टेड़े हालात का सामना आसानी से कर लेंगे. लॉटरी में मिलियन जीतने वाले लोग कुछ सालो तक तो मज़े से जीते है मगर फिर वापस उसी पुरानी हालत में पहुँच जाते है. अधिकतर लोगो के सवाल होते है कि अमीर कैसे बने? या अमीर बनने के लिए क्या करे ? इन सवालो के ज़वाब से अधिकतर लोगो को निराशा ही होती है. मगर इसका सही ज़वाब होगा कि पहले आप फानेंसियेली लिट्रेट बनना सीखे. देखिये ! अगर आपको एम्पायर स्टेट बिल्डिंग खड़ी करनी है तो सबसे पहले आपको एक गहरा गड्डा खोदना पड़ेगा, फिर उसके लिए एक मज़बूत नींव रखनी पड़ेगी. लेकिन अगर आपको एक छोटा सा घर बनाना हो तो एक 6 इंची कोंक्रीट स्लेब डालकर भी आपका काम चल जाएगा. मगर अफ़सोस तो इसी बात का है कि हम में से ज़्यादातर लोग 6 इंची स्लेब पर एक एम्पायर स्टेट बिल्डिंग खड़ी करना चाहते है. और वे ऐसा करते भी है तो ज़ाहिर है कि बिल्डिंग टूटेगी ही टूटेगी.


गरीब डेड रॉबर्ट से बस यही चाहते थे कि वे खूब पढ़ाई करे, लेकिन अमीर डेड उसे फिनेंसियेली लिट्रेट बनना चाहते थे. ज्यादातर स्कूल सिस्टम बस घर बनाना सिखाते है, मज़बूत फाउंडेशन नहीं. स्कूली शिक्षा और पढ़ाई की अपनी अहमियत है मगर असल जिंदगी में ये ही सब कुछ नहीं है.


रुल नो.1: लाएबिलिटीज़ और एस्सेट्स के बीच फर्क समझे और एस्सेट्स खरीदे.


सुनने में बड़ी आसान बात लगती है. लेकिन यही Ek रुल है जो आपको अमीर बनाने में मदद करेगा. अक्सर गरीब और मिडल क्लास लोग लाएबिलिटज को एस्सेट समझ लेते है. मगर अमीर जानता है कि असल में एस्सेट्स होते क्या है और वो वही खरीदता है. अमीर डेड “KISS” प्रिंसिपल में यकीन रखते है जिसका मतलब है कीप इट सिंपल, स्टूपिड. उन्होंने लेखक और उसके दोस्त माइक को यही सिंपल बात सिखाई जिसकी बदौलत वे इतनी मज़बूत फाउंडेशन रखने में कामयाब रहे. इस सीख की यही सिंपल बात है ki लाएबिलिटीज़ और एस्सेट्स के बीच फर्क समझे और एस्सेट्स खरीदे ... Lekin अगर ये इतना ही सिंपल है तो हर आदमी अमीर होता. है ना? मगर यहाँ मामला उल्टा है. ये दरअसल इतना सिंपल है कि हर कोई इस बारे में सोचता तक नहीं है. लोगो को लगता है कि उन्हें लाएबिलिटीज़ और एस्सेट्स के बीच फर्क पता है मगर उन्हें सिर्फ लिट्रेसी के बारे में मालूम है फैनेंशियेल लिट्रेसी के बारे में नहीं.


इनकम स्टेटमेंट को “प्रॉफिट और लॉस” का स्टेटमेंट मानकर चलना चाहिए. इसका सिंपल सा मतलब है . Income hai कि आपके पास कितना पैसा आया और expense hai ki aapse कितना पैसा खर्च हुआ. बेलेंस शीट एस्सेट्स और लाएबिलिटीज़ के बीच बेलेंस बताती है. बहुत से पढ़े-लिखे एकाउंटेंट्स को भी ये पता नहीं होता कि आखिर बेलेंस शीट और इनकम स्टेटमेंट कैसे एक दुसरे से जुड़े है. 


अब ये चार्ट देखने में बहुत सिंपल है, इसे आसानी से लोगो को समझाया जा सकता है. एस्सेट्स वे चीज़े होती है जो आपके लिए पैसे कमाने का काम करती है. मान लो आप कोई घर खरीदकर उसे किराए पर देते है तो उसी किराए से आप वो लोन भी चूका सकते है जो आपने घर खरीदने के लिए लिया था. अब घर भी आपका हुआ और उससे मिलने वाला किराया भी. इसके उलट लाएबिलिटीज़ आपकी जेब से पैसे खर्च करवाती है. जैसे कि घर खरीदकर उसमे रहने से आपको कोई किराया नहीं मिलने वाला. तो अब आप समझ गए होंगे कि अगर अमीर बनना है तो एस्सेट्स खरीदिए और गरीब ही रहना है तो लाएबिलिटीज़.


अमीर लोगो के पास ज्यादा पैसा इसलिए होता है कि वे इस प्रिंसिपल पर यकीन करते है. वही दूसरी तरफ गरीब लोग इस प्रिंसिपल को ठीक से समझ ही नहीं पाते. इसीलिए इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि सिर्फ लिट्रेट नहीं बल्कि फिनेंशियेली लिट्रेट बनिए.
सिर्फ नंबर्स से कुछ नहीं होता, फर्क तो तब पड़ता है जब आप अपनी कहानी खुद लिखे. अधिकतर परिवारों में ये देखा गया है कि जो मेहनती होता है उसके पास पैसा भी ज्यादा होता है मगर उसका फायदा क्या जब सारा पैसा लाएबिलिटीज़ में ही खर्च हो जाए.


ये चार्ट दिखाता है कि मिडल क्लास आदमी अपना पैसा किस तरह खर्च करता है. और अगर यही उनका तरीका रहता है तो सारी जिंदगी वे मिडल क्लास ही बनकर रहते है. या क्या पता उससे भी नीचे चले जाए. क्योंकि आप देख सकते है कि उनका सारा पैसा लाएबिलिटीज़ में ही खर्च हो रहा है. कभी मोर्टेज, कभी रेंट, कार लोन, हाउस लोन, क्रेडिट कार्ड का बिल, फीस और भी ना जाने क्या-क्या. उनकी सारी कमाई इसीमे खर्च हो जाती है. 
दूसरी ओर गरीब लोग है जिनकी कोई लाएबिलिटी तो नहीं है मगर उनके कोई एस्सेट्स भी नही होते. वे भी पैसा कमाते है, सेलेरी पाते है मगर हर रोज़ के खर्चो में उनका सारा पैसा उड़ जाता है. माना एक गरीब आदमी हज़ार डॉलर कमाता है. उसमे से 300 डॉलर वो अपने छोटे से घर के किराए में खर्चता है, 200 डॉलर उसके आने-जाने का किराया, 200 डॉलर टैक्स और 200 डॉलर खाने और कपड़ो में खर्च हो जाता है. अब उसके पास बचा क्या ? कुछ भी नहीं. और कभी कभी तो उधार लेकर काम चलाना पड़ता है जिससे वो और गरीब हो जाता है.



इसके उलट अमीर एस्सेट्स खरीद कर रखते है. फिर उनके वो एस्सेट्स उन्हें और पैसा कमा कर देते है. उनकी कमाई इसी तरह दो से चार, चार से आठ होती जाती है. अधिकतर अमीर लोग दिमाग से काम लेते है. वे घर लोन पर लेकर उसे किराए पर लगा देते है. बिना मेहनत के हर महीने किराया मिलता है जिससे वे अपना लोन भी चुकता कर लेते है. Maniye ki लोन की इंस्टालमेंट 1 डॉलर है तो ये अपने घर का 2 डॉलर किराया वसूल करेंगे. 1 डॉलर बैंक को देंगे 1 डॉलर अपनी जेब में. तो हो गया ना ये बिना मेहनत के पैसा कमाना.
तो असल में अमीर डैड और गरीब डैड के बीच बस सोच का फासला है. अपना पैसा कैसे खर्चे सिर्फ यही मुद्दे की बात है और कुछ नहीं.


1960 के दिनों में अगर बच्चो से पुछा जाता था कि वे बड़े होकर क्या बनेगे तो सबके पास यही जवाब होता था कि वे अच्छे ग्रेड्स लायेंगे और डॉक्टर बनेंगे. तब सबको यही लगता था कि अच्छे ग्रेड्स लेकर वे बहुत पैसा कमा सकेंगे. हालांकि उनमे से बहुत बच्चे आज बड़े होकर डॉक्टर बन चुके है. बावजूद इसके उनमे से काफी लोग आज भी फैनेंशियेली स्ट्रगल करते नज़र आयेगे. क्योंकि उन्हें हमेशा यही लगा कि ज्यादा पैसा कमाने से उनकी सारी परेशानियां दूर हो जायेंगी. मगर आज के दौर में ऐसा नहीं है. आज बहुत से बच्चे फेमस एथलीट बनना चाह्ते है या फिर सीईओ, या फिर कोई मूवी स्टार या रॉक स्टार. क्योंकि उन्हें पता है कि सिर्फ अच्छी पढ़ाई और अच्छे ग्रेड्स के भरोसे बैठकर वे करियर में सक्सेस नहीं पा सकते. आजकल फैनेंशियेल नाईटमेयर बहुत आम हो गया है. अक्सर नए शादी-शुदा जोड़े ये सोचते है कि उनकी सेलेरी अब डबल हो जायेगी क्योंकि दोनों जने कमा रहे है. एक छोटे से घर में रहते हुए वे अब बड़े घर के सपने देखते है. इसलिए वे पैसा बचाना शुरू कर देते है. इसकी वजह से उनका सारा ध्यान सिर्फ अपना करियर बनाने पर होता है. उनकी कमाई बड़ने लगती है तो ज़ाहिर है उसी हिसाब से खर्चे भी. अब जब आप फैनेंशियेली लिटरेट हुए बिना पैसा बनाते है या बिना सोचे समझे उसे खर्च करते है तो होता ये है कि आप पहले से भी ज्यादा खर्च करने लगते है. ये एक ऐसा चक्कर है जो फिर चलता ही रहता है. नए जोड़े ने अब इतना पैसा कमा लिया कि वे एक बड़ा घर खरीद सके. उन्हें तो यही लगेगा कि वे अब थोड़े अमीर हो गए है. मगर असलियत तो ये है कि बड़े घर के साथ उन्होंने नयी लाएबिलिटीज़ भी खरीद ली है. उनके कैश फ्लो में अब प्रॉपर्टी टैक्स का खर्च बड गया. अब उन्हें एक नयी गाडी भी चाहिए, फर्नीचर भी, सब कुछ नया. उनकी लाएबिलिटीज़ बडती ही चली जा रही है. और ज़्यादातर होता यही है कि इनकम के साथ-साथ खर्चे भी बड़ने लगते है. फिर एक दिन अचानक इस सच्चाई का खुलासा होता है, मगर तब तक हम इस रेट रेस में बुरी तरह फंस चुके होते है.



फिर ऐसे ही लोग हमारे लेखक रोबर्ट के पास आकर पूछते है कि अमीर कैसे बना जाए ? अब यही सवाल तो मुसीबत की जड़ है क्योंकि सबको लगता है कि पैसा ही हर चीज़ का इलाज़ है. ये मानना ही एक बड़ी गलती है. उनकी समस्या ये नहीं है की वे ज्यादा नहीं कमा रहे. बल्कि ये है कि जो कुछ उनके पास है उसे हेंडल कैसे करे. एक कहावत है जो यहाँ पर लागू होती है “ जब तुम खुद को एक गहरे गड्डे में पाओ तो और खोदना छोड़ दो”



क्यों ज़्यादातर लोग पब्लिक स्पीकिंग से घबराते है ? मनोचिकित्सको का मानना है कि लोग इसलिए घबराते है क्योंकि उन्हें रिजेक्शन का डर होता है, औरो से अलग होने का भय होता है. लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे या हम पर कहीं हंस ना दे, यही सोच कर अधिकाँश लोग पब्लिक स्पीकिंग से दूर भागते है. वे वही करना पसंद करते है jo सब कर रहे होते है. वे खुद को भीड़ का हिस्सा बनाकर संतुष्ट हो जाते है. "आपका घर आपका सबसे बड़ा एस्सेट है”,“लोन लीजिए”, अब प्रमोशन हो गया है”, अब सेलेरी बड गयी है तो नया घर लो”,यही सब बाते हम लोगो से सुनते रहते है. और फिर हम भी उसी रास्ते पर चल पड़ते है क्योंकि जो सब कर रहे है वो ज़रूर सही होगा. है कि नहीं ? मगर नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है. अमीर डैड ने कहा था कि जापानीज़ लोग तीन चीजो की ताकत जानते थे. तलवार, कीमती जवाहरात और शीशा. तलवार बाजुओ की ताकत का प्रतीक है, कीमती जवाहरात पैसे की ताकत का और शीशा खुद के अंदर छुपी हुई ताकत को दिखाता है. और वही हमारी सबसे बड़ी ताकत है. जब आप खुद को जानते हो, शीशे के सामने अगर आप खुद से सवाल पूछ सकते हो कि मै सही हूँ या मुझे भी भीड़ का हिस्सा बनकर रहना चाहिए, तो जो जवाब आपको मिलेगा वही आपकी असली ताकत है.


गरीब और मिडल क्लास खुद को पैसे का गुलाम बनने देते है इसीलिए वो कभी अमीर नहीं बन पाते.



16 साल के रोबर्ट और माइक अमीर डैड के साथ हर उस मीटिंग में जाया करते थे जो वे अपने एकाउंटेंट, मेनेजेर्स, इन्वेस्टर और एम्प्लोयियों के साथ रखा करते. यहाँ एक ऐसे अमीर डैड देखने को मिलते है जो पढ़े-लिखे नहीं है, जिन्होंने 13 साल में ही स्कूल छोड़ दिया था मगर आज वो मीटिंग्स रखते है, अपने नीचे काम करने वाले पढ़े-लिखे लोगो को आर्डर देते है, उन्हें बिजनेस के टिप्स समझाते है. एक ऐसा इंसान जो भीड़ का हिस्सा नहीं बना, जिसने रिस्क लिया और जिसने लोगो की परवाह नहीं की. जिसे ये डर नहीं था कि लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे ? इन मीटिंग्स का नतीजा ये हुआ कि लेखक और उनका दोस्त दोनों ही स्कूली पढ़ाई में मन नहीं लगा पाए. जब भी उनकी टीचर कोई काम देती थी, उन्हें रूल्स के हिसाब से करना होता था. उन्हें एहसास हुआ कि स्कूली पढ़ाई किस तरह से बच्चो की प्रतिभा को निखरने नहीं देती. उनकी क्रियेटिविटी को मार कर उन्हें एक सांचे में ढाल कर इस समाज का एक मशीनी हिस्सा भर बना देती है. और उन्हें टीचर की इस बात से भी इंकार था कि अच्छे ग्रेड्स लाकर ही सक्सेसफुल और अमीर बना जा सकता है. एक दिन रॉबर्ट की अपने गरीब डैड से बहस हो गयी. उनके पिता का मानना था कि उनका घर उनके लिए सबसे बेस्ट इन्वेस्टमेंट है. मगर वो एक RAT RACE में भाग रहे थे. उनकी इनकम और खर्चे बराबर ही थे. उन्हें पूरा करने के लिए उनके पास एक पल की भी फुर्सत नहीं थी. यही बात रॉबर्ट उन्हें समझाना चाह रहे थे कि उनके पिता के लिए वो घर एस्सेट नहीं लाएबिलिटी है. घर पर उनके पैसे खर्च हो रहे थे बदले में मिल कुछ नहीं रहा था. ये बात उनके गरीब डैड समझ नहीं पा रहे थे और यही फर्क था गरीब और अमर डैड के बीच. खैर, उनकी बहस चलती रही. उन्होंने अपने गरीब पिता को बताया कि अधिकतर लोगो की जिंदगी लोन चुकाने में ही निकल जाती है. जिस घर को वे खरीदते है उसके लिए वे 30 साल तक लोन भरते है. फिर एक और बड़ा घर लेते है और पाना लोन रिन्यू करवाते है. अब घर की कीमत भी उसी हिसाब से बड़ेगी या नहीं ये निर्भर करता है. कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होंने घर खरीदने के लिए एक बड़ी रकम ली थी. जितनी घर की कीमत नहीं थी उससे ज्यादा क़र्ज़ उनके सर पर चढ़ गया. इसका सबसे बड़ा नुकसान लोगो को ये होता है कि वे बाकी जगह इन्वेस्टमेंट नहीं कर पाते क्योंकि उनका सारा पैसा उस घर पर लगा है. उन्हें कभी इन्वेस्टमेंट करने का मौका ही नहीं मिल पाता और ना ही वे इस बारे में कुछ सीख पाते है. और इस तरह कई एस्सेट्स उनके हाथ से निकल जाते है. अगर इसके बदले लोग सिर्फ एस्सेट्स पर ध्यान दे तो उनका फ्यूचर कहीं ज्यादा बेहतर हो सकता है. 


अब उदाहरण के लिए रॉबर्ट की पत्नी के पेरेंट्स एक बड़े से घर में शिफ्ट हो गए. उनका सोचना था कि अपने लिए बड़ा और नया घर लेना एक सही फैसला है. क्योंकि बाकियों की तरह उन्हें भी घर लेना एक एस्सेट्स लगता था. मगर वे ये जानकर हैरान रह गए कि उस घर का प्रॉपर्टी टैक्स 1000 डॉलर था. ये उनके लिए एक बड़ी कीमत थी. और क्योंकि वे रिटायर हो चुके थे तो इतना पैसा टैक्स के रूप में भरना उनके रिटायर्मेंट बजट के बाहर था. बेशक हम ये नहीं कह रहे कि आप एक नया घर ना ले. बल्कि हम समझाना चाहते है कि जितने पैसे से आप एक बड़ा घर लेंगे उतने पैसे आप किसी एस्सेट में इन्वेस्ट करे तो बेहतर होगा. आपका एस्सेट आपके लिए कमाई करेगा और कुछ ही समय बाद आपके पास इतना पैसा होगा कि आप आसानी से मनपसंद घर ले पायेंगे वो भी बिना किसी लोन के


अमीर और ज्यादा अमीर क्यों होते रहते है, वहीँ मिडल क्लास आगे क्यों नहीं बड पाते, इसके पीछे भी एक वजह है. कारण सीधा है, अमीर एस्सेट खरीदते है जो उनका पैसा दुगना करता रहता है. उस पैसे से उनके सारे खर्चे मजे में निपट जाते है. और मिडल क्लास क्या करते है ? वे तो बस महीने की एक तारीख का इंतज़ार करते है जब उनकी सेलेरी आये. सारी की सारी सेलेरी तो खर्चो को पूरा करने में खत्म हो जाती है तो इन्वेस्टमेंट कहाँ से होगा. और फिर जब सेलेरी बडती है तो उस पर टैक्स भी बड़ जाता है और उसी हिसाब से बाकी खर्चे भी. फिर अंत में वही RAT RACE चलती रहती है.



एक कर्ज में डूबा समाज, जहाँ हम रहते है:


अपने घर को एस्सेट समझना ही वो वजह है जो हमें कर्ज के बोझ तले दबाती है. आज यही अधिकतर लोगो की सोच है. अगर सेलेरी बड़ी है तो लोग सोचते है कि अब वे बड़ा सा घर ले सकते है क्योंकि उन्हें ये अपने पैसे का सही इस्तेमाल लगता है. इसके बदले अगर वही पैसा सही जगह लगाया जाए तो उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती है. लेकिन ऐसा हो नहीं pata क्योंकि उनका सारा वक्त हाड़-तोड़ मेहनत करने में चला जाता है. अपनी नौकरी को सेफ ज़ोन समझ कर वे उससे अलग कुछ सोच ही nhi पाते. और साथ ही उनपर कर्ज का इतना बोझ होता है कि वे नौकरी छोड़ने का रिस्क ले ही नहीं सकते. अब ज़रा खुद से ये सवाल कीजिये कि आज आप नौकरी छोड़ कर बैठ जाते है तो कितने दिन आपका गुज़ारा चलेगा ? क्योंकि अगर आप फिनेंशियेली लिटरेट नहीं है, अगर आपने सारी उम्र सिर्फ सेलेरी के भरोसे ही काटी है, और एस्स्ट्स के बदले आपने लाएबिलिटीज़ ली है तो यकीनन आपकी जिंदगी एक कड़ी चुनौती है.




सिर्फ नेट वर्थ के भरोसे आपका काम नहीं चल सकता. नेट वर्थ बताता है कि आपके पास वाकई में कितना पैसा है चाहे वो एक गैराज में पड़ी पुरानी कार के रूप में ही क्यों ना हो. अब भले ही वो कार कुछ काम की नहीं हो. जबकि वेल्थ का मतलब है कि आपके पास जो पैसा है उससे आप कितना और पैसा कमा रहे है. जैसे कि मान लीजिये आपके पास कोई एस्सेट है जिससे हर महीने मुझे 3000 डॉलर की कमाई हो जाती है, और हर महीने आपके 6000 डॉलर खर्चे है तो मै सिर्फ आधे महीने ही अपना गुज़ारा कर पाऊंगा. तो सोल्यूशन ये होगा कि अपने एस्स्ट्स से मिलने वाला पैसा बड़ा दे. जब वो 6000 डॉलर मिलने लगेगा तो आप रातो रात अमीर नहीं हो जायेंगे मगर इस तरह आप वेल्थी होने लगेंगे. अब अगर आप अचानक नौकरी छोड़ते भी है तो आपके एस्सेट्स सारा खर्च कवर कर लेंगे. आप वेल्थी तभी बन पायेंगे जब आपके खर्च आपके एस्सेट्स की ग्रोथ से कम रहे.



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